Sunday, November 12, 2017

कुछ बातें करनी थी तुमसे,
जो मैं ज़रूर करता अगर,
मौक़ापरस्त ना होती तुम।
पर फिर भी मैं पूछूँगा तुमसे,
पूछूँगा! क्योंकि वो सारी बातें जो कभी तुमने करी थी मुझसे,
वो आज सवाल हैं मेरे,
उनका जवाब हो तुम!

मौक़ा मिले तो बताना मुझे,
और बता पाना तो बताना मुझे,
कि जिन आँसुओं को कभी यूहीं चूम लिया करता था मैं,
वो भी यूहीं पोंछ देता है क्या?
या फिर सूख कर आखों की सफ़ेदी में रम गए तुम्हारी, वो आँसू?

मौक़ा मिले तो बताना मुझे,
और बता पाना तो बताना मुझे,
कि जिस मुस्कुराहट के लिए यूहीं दौड़ आया करता था मैं,
वो भी आया करता है क्या?
या फिर तुम्हारी ख़ामोशी की गूँज में छिटक कर यूहीं बिखर गयी तुम्हारी, वो मुस्कुराहट?

मौक़ा मिले तो बताना मुझे,
और बता पाना तो बताना मुझे,
कि तुम्हारे नाराज़ होने पर जैसे तुम्हें मनाया करता था मैं,
वो भी मनाता है क्या?
या फिर तुम्हारे मिज़ाज की गरमी में पसीना बन कर बह गयी तुम्हारी, वो नराज़गी?

मौक़ा मिले तो बताना मुझे।
और बता पाना तो बताना मुझे,
कि तुम्हारे दर्द में छटपटाने पर जैसे कराहा करता था मैं,
वो भी वैसे ही कराहता है क्या?
या फिर तुम्हारी ज़िंदगी के आक्रोश में एक पुकार की तरह दब गयी तुम्हारी, वो छटपटाहट?

मौक़ा मिले तो बताना मुझे।
और बता पाना तो बताना मुझे,
कि तुम्हारे भूखे होने पर जैसे तुम्हें निवाले खिलाया करता था मैं,
वो भी वैसे ही खिलाता है क्या?
या फिर तुम्हारी ज़िंदगी के स्वाद में एक खुराक बन कर रह गयी है तुम्हारी, वो भूख?

ये कुछ बातें करनी थी तुमसे,
जो मैं ज़रूर करता अगर,
मौक़ापरस्त ना होती तुम।
पर फिर भी मैं पूछूँगा तुमसे,
पूछूँगा! क्योंकि वो सारी बातें जो कभी तुमने मुझसे करी थी,
वो आज सवाल हैं मेरे,
उनका जवाब हो तुम!

-संकल्प




Thursday, September 7, 2017

In Solidarity with Gauri Lankesh- चेहरे

ना जाने कितने अनजान चेहरे खड़े हैं एकजुट,
जिनके चेहरे मैं जानता हूँ,
एक ऐसे चेहरे के लिए,
जिसको उसके क़ातिल कभी भुला ना पाएँगे।
भूलने नहीं देंगे उसका चेहरा, उनको जो-
जो चुप्पी साधे बड़े कर्मयोगी बने फिरते हैं,
जो भीतर कुछ नहीं बस सिर्फ़ एक शून्य हैं,
भुलाने नहीं देंगे उसकी मौत।
खड़े रहेंगे, डटे रहेंगे,
और तुम मारते रहो, हम मरते रहेंगे।
देखेगा हिंदुस्तान भी अब,
कि कुतिया और कुत्ते कैसे शहीद होते हैं।
कितनी वफ़ा लिए वतन के लिए रखते हैं देखोगे तुम भी-
तुम, जिसकी परिभाषा में किसी कुतिया का कुत्ते की मौत मरना-
तुम्हारी पौरुशता की औक़ात बताता है,
अरे! तुम क्या जानो कुत्ते कैसे वफ़ादार होते हैं-
तुम्हें चाहने वाले सर्वोच कर्मढोंगी ख़ुद कुत्ते से बहुत डरते हैं।
एक बार मिसाल उसने भी दी थी एक हुंकार भरके,
की कुत्ता भी गाड़ी के नीचे आ जाए तो कैसा लगता है,कहा था उसने-
अब तुम जानोगे की कुत्त जब अपनी पे आजाए,
तो कैसा लगता है।
ना जाने कितने अनजान चेहरे खड़े हैं एकजुट,
जिनके चेहरे मैं जानता हूँ,
एक ऐसे चेहरे के लिए,
जिसको उसके क़ातिल कभी भुला ना पाएँगे।

Saturday, March 25, 2017

लड़ते-लड़ते लड़ना भूल गए हैं...

कुछ शब्द पढ़ना भूल गए हैं,
लड़ते-लड़ते लड़ना भूल गए हैं।
वाजिब है तख़रीर होना,
आख़िर-तर्क ही तो तख़रीर है।
पर अब तो आलम है ऐसा की,
अर्थ शब्द के गढ़ना भूल गए हैं,
लड़ते-लड़ते लड़ना ही भूल गए हैं।

आइना भी अक्सर पूछे है,
तुम ऐसे मुझे क्यूँ देखते हो?
वो भी है अबसे दुश्मन अपना,
कहता हैं हम- सवाल तुम्हारे हैं-अपने पास ही रखना।
अब तो आलम है ऐसा की,
सवाल समझना भूल गए हैं,
लड़ते-लड़ते लड़ना ही भूल गए हैं।

राष्ट्रवादी हैं हम या हूँ बहु-राष्ट्रवादी,
सुबह शाम बस यही बहस होती है।
आस्था को मिथ्या कहकर,
तड़ीपार होने की माँग होती है।
भारत माता की जय भी है,
मादरे-वतन कहने का भी है शौक़,
पर बहस तो मखौल है,
कुछ ऐसा ही माहौल है,
अब तो आलम है ऐसा की,
बुनियादी हक़ीक़त भूल गए हैं,
लड़ते-लड़ते लड़ना ही भूल गए हैं।

वो मंदिर था या थी मस्जिद,
बस इसी की व्याख्या होती है।
क्यूँ ना चलके ईश्वर भूमि परकुछ और नया रच देते हैं?
आओ चलो लेकर सीमेंट-ईट,
पाठशाला का निर्माण कर देते हैं।
पर अब तो आलम है ऐसा की,
मिलके चलना भूल गए हैं।
लड़ते-लड़ते लड़ना ही भूल गए हैं।
माँ-पिता में भगवान को पाना,
दादी-नानी ने सिखलाया था।
पर तैश है ऐसा-ऐसे तेवर,
बस जंग की बातें होती हैं-
पर अब तो आलम है ऐसा की,
वो सीखें सारी भूल गए हैं-
लड़ते-लड़ते लड़ना ही भूल गए हैं।

जब कुछ खो रहा होता है।



लग जाती है भनक-
जब कुछ खो रहा होता है।
कहीं अंदर बहुत सीने में दफ़्न पड़ा,
कुछ महसूस हो रहा होता है।

दफ़्न किए उम्मीद उसे ख़ून फेंकती रहती है,
दिल कहता है, ना करो, मानूँगा नहीं-
पर फिर भी कहती रहती है-
नहीं, नहीं जा रहा कही भी वो जिसको तुम बसाए बैठे हो,
लगे रहे-डटे रहो-हारना नहीं है,
यूँ! क्यों घबराए बैठे हो?

कहता है दिल कि सच हूँ मैं,
इसलिए सहमाया बैठा हूँ,
ना कर ज़्यादा मन की बातें,
हट जा ऊपर से कहता हूँ।
जान रहा हूँ मसला सारा,
मन तो मुग़ालते का शौक़ीन हैं,
पर मैं तो सच में रहता हूँ।

छूट रहा है मुझसे कुछ-
खो रहा हूँ क़तरा-क़तरा,
बसा था मेरे भीतर जो,
आ गया है उसपे अब ख़तरा।

महसूस कर लेने दे या फिर,
मनहूस ही यूँ रुक जाऊँगा।
बनाया ही ऐसा बुड़बक मुझको,
ख़ुद को मैं रोक ना पाऊँगा।
धड़कता रहा हूँ बरसो से,
अब है थकान सो जाने दे-
जो जा रहा है उसको तू,
बिना किसी रुकावट जाने दे।

मेरा क्या है- अब तो हूँ टूटा,
टूटा ही सही पर जाने दे-
रुकने दे मुझको या हट तो जा,
होगी मुश्किल या नामुमकिन कोशिश,
पर पास किसी और के तो जाने दे!
ना जा पाया पास किसी और के गर ,
तो चलूँगा या थक कर मैं थम जाऊँगा,
उम्मीद है तू,अब मान भी जा-
अब तू भी मुझपे ज़ुल्म ना कर,
वादा है तेरी एकतरफ़ा मोहब्बत का, 
ज़िंदा रहा तो तेरे पास ही आऊँगा।



Wednesday, October 5, 2016

गरीब ने खरीद लिया.

एक दोस्त ने मुझे सलाह दी थी. जो कहना है ब्लॉग पे लिख कर शेयर किया करो. जिसे पढ़ना होगा पढ़ेगा. पर आज मैं ब्लॉग पे न लिखकर यही लिखूंगा। इसलिए क्योंकि जर्नलिज्म की पढाई करने के बाद भी मेरी इतनी पहुँच नहीं है की मैं कही अपनी बात को छपवा पाऊं और इसलिए भी क्योंकि मैं समझ गया हूँ की ब्लॉग का लिंक खोलने की ज़हमत ज़्यादा लोग उठाना नहीं चाहते. संपन्न होने का एहसास मुझे फेसबुक भी करता है और इसीलिए इसी सम्पन्नता का फायदा उठाते हुए मैं यहाँ पे कहूंगा. जिसे पढ़ना हो वो पढ़ले वरना न पढ़े जाने की मेरे शब्दों को आदत है. लेखक हूँ. इतना स्पोर्टिंग हूँ. 
आजकल २४ घंटे न्यूज़ चैनल से लेकर फेसबुक तक बहुत क्रांति छायी है. कोई देशहित की बात करने का दूत है और कोई देशद्रोही है. अच्छी बात है. आज़ादी के 69 साल बाद छटाई का एक दौर चला है. नेशनलिस्ट और एंटी नेशनलिस्ट की छटाई का. बढ़िया है. जो नेशनलिस्ट हैं वो भारत में रहेंगे। जो नहीं हैं उन्हें सलाह दी जायेगी की पाकिस्तान चले जाएँ या भाड़ में जाएँ. ये भी बढ़िया है. सस्ती छटाई का दौर. 
सनसनीखेज़ और विस्फोटक न्यूज़ का दौर है. हर वक़्त बस शहादत की बातें कूट कूट के कही जा रही हैं. कसर बस इतनी है की ठेले पे पार्थिव शरीर रखके उसका मार्च नहीं निकाला जा रहा. बाकी रोज़ पंचायत बैठती है और पेशी लगती है. न्यूज़रूम में खड़ा एंकर बड़े आराम से नेशनलिस्ट कौन है और कौन नहीं ये बता देता है. जनता भी पुरे विश्वास के साथ इस फैसले और तर्क को मान लेती है.
मैं 90 के दशक में पैदा हुआ हूँ. मेरी देशभक्ति पे अगर कोई सवाल उठता है तो मुस्कुराने के अलावा मेरे पास कोई दूसरा हथियार नहीं है. पर मैंने टीवी का दौर देखा है, सोशल मीडिया का दौर देख रहा हूँ और इस में जी रहा हूँ. एक सवाल आता है मन में कि अगर इतने ज़्यादा लोग ही देशद्रोही थे तो 69 साल तक देश टूटने से कैसे बचा रहा? आखिर ऐसे सारे लोग अगर भारतीय नहीं हैं तो सब पाकिस्तान के एम्बेसडर रहे होंगे। तो क्या ये सभी आज से पहले जो 4 युद्ध लड़े गए उसमे चीन के साथ हार पे ताली बजा रहे थे? या जब जब कोई सैनिक शहीद होता है तो क्या ये सभी लुत्फ़ उठाते हैं? सच तो ये है की ये सब बातें सतही यानी की सुपरफीशिअल होती जा रही हैं. ज़रूरत से ज़्यादा प्रचार और टीवी न्यूज़ चैनल्स जो हमे पागल कर देंगे. टीवी इंडस्ट्री में हूँ तो पता लगता रहता है की सास बहु शो और अन्य टीवी शो की टीआरपी कम हो गयी है. वो इसलिए क्योंकि आजकल न्यूज़ चैनल पे ड्रामा, रोमांस, थ्रिलर,सस्पेंस, हॉरर, साई-फाई सब मौजूद है. ज़रूरत है कि खुद को ज़रा अपनी संपन्न दुनिया से बाहर निकालके पूछे हम खुदसे की क्या सच मच ये मुद्दे ऐसे हैं जैसा की इन्हें हम देखते हैं? क्या मैं और आप इस लड़ाई में जूझ कर फालतू नफरत में लिप्त नहीं हो रहे की मैं देशभक्त और तू देशद्रोही! 
बाहर निकालके ज़रा एक बार गरीबी को देखते हैं. और एक garib से जाकर पूछते हैं उसे क्या चाहिए. वो दो रोटी की बजाय अगर कुछ और मांगले तो मैं समझ जाऊंगा की हम जिस दिशा में बातें और व्यव्हार के स्तर पे जा रहे हैं वो एकदम सही है.
आज जहाँ एक पत्रकार अपने सिवा बाक़ी सबको डिज़ाइनर पत्रकार साबित करने में लगा हुआ है उसी दौर में एक 'सो कॉल्ड डिज़ाइनर' पत्रकार जो वाकई में जीरो रेटिंग पत्रकार है है उसे गरीबी ने खरीद लिया साहब. जब सरे चैनल भारत और पाकिस्तान
में युद्ध की खबर दिखाए डाल रहे हैं, वो गरीबी के बारे में चर्चा कर रहा है .सही है, शायद उसे गरीबी ने अरबो डॉलर में खरीद लिया होगा। रविश कुमार नाम है उनका. आपकी नज़र में अब भी वो बिका हुआ डिज़ाइनर पत्रकार ही रहेगा शायद. आपके अपने तर्क होंगे. 
ऐसा नहीं है की पाकिस्तान से निपटारा ज़रूरी नहीं है. बेहद है. पर आपस में टूटकर नहीं. मान लेते हैं न...थोड़े बेईमान तुम, थोड़े बेईमान हम, थोड़े ईमानदार तुम, थोड़े ईमानदार हम. और रही बात सैनिकों की शहादत की तो उसका तमाशा नहीं बनने देना है. उसकी इज़्ज़त हमसे कहीं ज़्यादा है. और यकीन मानिये, कोई भी भारतीय उनकी मौत का जश्न नहीं मन सकता. रही बात किसने क्या बोला...तो सोचना होगा उस बात को जो बड़े बुज़ुर्ग कह गए, ज़रूरत से ज़्यादा एक ही बात को कुरेदने से बात ख़राब ही होती है. और उससे भी ज़्यादा बड़ी बात, टीवी कम देखना चाहिए.