This is my wall. A wall that is scribbled by the thoughts of a person who is highly ambitious, who has tasted failure and humbly moves on with whatever success he has but always striving for bigger and better. An alumnus of Xavier Institute of Communication, a philosopher at heart and a filmmaker by profession, this wall is a showcases my thoughts. And the idea is not just to keep it to myself but to open it to everyone for a healthy discourse.
Monday, November 20, 2017
Thursday, November 16, 2017
रिश्ते
अमावस की रात में,
जब छाया अँधेरा घना हो,
तो देखना आसमान को।
हो सके तो ढूंढ कर तारे-
पूर्णिमा की रातें भर लेना।
उस पतली चारपायी पर लेटकर, खुदसे-
मेरे हिस्से की बातें कर लेना।
यहाँ मैं हूँ, वहाँ तुम हो,
हमारे दरमियाँ इस सड़क में,
जो हो गए गहरे गड्ढे हैं,
हो सके तो उनमें ज़रा मिट्टी तुम जाके भर देना।
आधे रास्ते चलना तुम,
आधा मैं आजाऊँगा,
दिख जाऊँगा मैं,
ना दिखूँ तो आवाज़ दे लेना।
दिख गए तुम मुझको गर पहले,
मेरी चीख़ तुम सुन लेना।
तुम रोना मत, मैं रो लूँगा,
तुम हास देना मेरी बातों पर,
रिश्ता ही तो था, गाँठ ही तो है,
खोलूँ जब दख़ल ना देना।
खुलने देना गाठें सारी, और-
धागा जब हो सीधा-सुलझा,
तो तोड़ना मत- बस इतना कर लेना।
-संकल्प
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Sunday, November 12, 2017
कुछ बातें करनी थी तुमसे,
जो मैं ज़रूर करता अगर,
मौक़ापरस्त ना होती तुम।
पर फिर भी मैं पूछूँगा तुमसे,
पूछूँगा! क्योंकि वो सारी बातें जो कभी तुमने करी थी मुझसे,
वो आज सवाल हैं मेरे,
उनका जवाब हो तुम!
मौक़ा मिले तो बताना मुझे,
और बता पाना तो बताना मुझे,
कि जिन आँसुओं को कभी यूहीं चूम लिया करता था मैं,
वो भी यूहीं पोंछ देता है क्या?
या फिर सूख कर आखों की सफ़ेदी में रम गए तुम्हारी, वो आँसू?
मौक़ा मिले तो बताना मुझे,
और बता पाना तो बताना मुझे,
कि जिस मुस्कुराहट के लिए यूहीं दौड़ आया करता था मैं,
वो भी आया करता है क्या?
या फिर तुम्हारी ख़ामोशी की गूँज में छिटक कर यूहीं बिखर गयी तुम्हारी, वो मुस्कुराहट?
मौक़ा मिले तो बताना मुझे,
और बता पाना तो बताना मुझे,
कि तुम्हारे नाराज़ होने पर जैसे तुम्हें मनाया करता था मैं,
वो भी मनाता है क्या?
या फिर तुम्हारे मिज़ाज की गरमी में पसीना बन कर बह गयी तुम्हारी, वो नराज़गी?
मौक़ा मिले तो बताना मुझे।
और बता पाना तो बताना मुझे,
कि तुम्हारे दर्द में छटपटाने पर जैसे कराहा करता था मैं,
वो भी वैसे ही कराहता है क्या?
या फिर तुम्हारी ज़िंदगी के आक्रोश में एक पुकार की तरह दब गयी तुम्हारी, वो छटपटाहट?
मौक़ा मिले तो बताना मुझे।
और बता पाना तो बताना मुझे,
कि तुम्हारे भूखे होने पर जैसे तुम्हें निवाले खिलाया करता था मैं,
वो भी वैसे ही खिलाता है क्या?
या फिर तुम्हारी ज़िंदगी के स्वाद में एक खुराक बन कर रह गयी है तुम्हारी, वो भूख?
ये कुछ बातें करनी थी तुमसे,
जो मैं ज़रूर करता अगर,
मौक़ापरस्त ना होती तुम।
पर फिर भी मैं पूछूँगा तुमसे,
पूछूँगा! क्योंकि वो सारी बातें जो कभी तुमने मुझसे करी थी,
वो आज सवाल हैं मेरे,
उनका जवाब हो तुम!
-संकल्प
Thursday, September 7, 2017
In Solidarity with Gauri Lankesh- चेहरे
ना जाने कितने अनजान चेहरे खड़े हैं एकजुट,
जिनके चेहरे मैं जानता हूँ,
एक ऐसे चेहरे के लिए,
जिसको उसके क़ातिल कभी भुला ना पाएँगे।
जिनके चेहरे मैं जानता हूँ,
एक ऐसे चेहरे के लिए,
जिसको उसके क़ातिल कभी भुला ना पाएँगे।
भूलने नहीं देंगे उसका चेहरा, उनको जो-
जो चुप्पी साधे बड़े कर्मयोगी बने फिरते हैं,
जो भीतर कुछ नहीं बस सिर्फ़ एक शून्य हैं,
भुलाने नहीं देंगे उसकी मौत।
जो चुप्पी साधे बड़े कर्मयोगी बने फिरते हैं,
जो भीतर कुछ नहीं बस सिर्फ़ एक शून्य हैं,
भुलाने नहीं देंगे उसकी मौत।
खड़े रहेंगे, डटे रहेंगे,
और तुम मारते रहो, हम मरते रहेंगे।
देखेगा हिंदुस्तान भी अब,
कि कुतिया और कुत्ते कैसे शहीद होते हैं।
और तुम मारते रहो, हम मरते रहेंगे।
देखेगा हिंदुस्तान भी अब,
कि कुतिया और कुत्ते कैसे शहीद होते हैं।
कितनी वफ़ा लिए वतन के लिए रखते हैं देखोगे तुम भी-
तुम, जिसकी परिभाषा में किसी कुतिया का कुत्ते की मौत मरना-
तुम्हारी पौरुशता की औक़ात बताता है,
अरे! तुम क्या जानो कुत्ते कैसे वफ़ादार होते हैं-
तुम्हें चाहने वाले सर्वोच कर्मढोंगी ख़ुद कुत्ते से बहुत डरते हैं।
तुम, जिसकी परिभाषा में किसी कुतिया का कुत्ते की मौत मरना-
तुम्हारी पौरुशता की औक़ात बताता है,
अरे! तुम क्या जानो कुत्ते कैसे वफ़ादार होते हैं-
तुम्हें चाहने वाले सर्वोच कर्मढोंगी ख़ुद कुत्ते से बहुत डरते हैं।
एक बार मिसाल उसने भी दी थी एक हुंकार भरके,
की कुत्ता भी गाड़ी के नीचे आ जाए तो कैसा लगता है,कहा था उसने-
अब तुम जानोगे की कुत्त जब अपनी पे आजाए,
तो कैसा लगता है।
की कुत्ता भी गाड़ी के नीचे आ जाए तो कैसा लगता है,कहा था उसने-
अब तुम जानोगे की कुत्त जब अपनी पे आजाए,
तो कैसा लगता है।
ना जाने कितने अनजान चेहरे खड़े हैं एकजुट,
जिनके चेहरे मैं जानता हूँ,
एक ऐसे चेहरे के लिए,
जिसको उसके क़ातिल कभी भुला ना पाएँगे।
जिनके चेहरे मैं जानता हूँ,
एक ऐसे चेहरे के लिए,
जिसको उसके क़ातिल कभी भुला ना पाएँगे।
Saturday, March 25, 2017
लड़ते-लड़ते लड़ना भूल गए हैं...
कुछ शब्द पढ़ना भूल गए हैं,
लड़ते-लड़ते लड़ना भूल गए हैं।
वाजिब है तख़रीर होना,
आख़िर-तर्क ही तो तख़रीर है।
पर अब तो आलम है ऐसा की,
अर्थ शब्द के गढ़ना भूल गए हैं,
लड़ते-लड़ते लड़ना ही भूल गए हैं।
आइना भी अक्सर पूछे है,
तुम ऐसे मुझे क्यूँ देखते हो?
वो भी है अबसे दुश्मन अपना,
कहता हैं हम- सवाल तुम्हारे हैं-अपने पास ही रखना।
अब तो आलम है ऐसा की,
सवाल समझना भूल गए हैं,
लड़ते-लड़ते लड़ना ही भूल गए हैं।
राष्ट्रवादी हैं हम या हूँ बहु-राष्ट्रवादी,
सुबह शाम बस यही बहस होती है।
आस्था को मिथ्या कहकर,
तड़ीपार होने की माँग होती है।
भारत माता की जय भी है,
मादरे-वतन कहने का भी है शौक़,
पर बहस तो मखौल है,
कुछ ऐसा ही माहौल है,
अब तो आलम है ऐसा की,
बुनियादी हक़ीक़त भूल गए हैं,
लड़ते-लड़ते लड़ना ही भूल गए हैं।
वो मंदिर था या थी मस्जिद,
बस इसी की व्याख्या होती है।
क्यूँ ना चलके ईश्वर भूमि परकुछ और नया रच देते हैं?
आओ चलो लेकर सीमेंट-ईट,
पाठशाला का निर्माण कर देते हैं।
पर अब तो आलम है ऐसा की,
मिलके चलना भूल गए हैं।
लड़ते-लड़ते लड़ना ही भूल गए हैं।
माँ-पिता में भगवान को पाना,
दादी-नानी ने सिखलाया था।
पर तैश है ऐसा-ऐसे तेवर,
बस जंग की बातें होती हैं-
पर अब तो आलम है ऐसा की,
वो सीखें सारी भूल गए हैं-
लड़ते-लड़ते लड़ना ही भूल गए हैं।
लड़ते-लड़ते लड़ना भूल गए हैं।
वाजिब है तख़रीर होना,
आख़िर-तर्क ही तो तख़रीर है।
पर अब तो आलम है ऐसा की,
अर्थ शब्द के गढ़ना भूल गए हैं,
लड़ते-लड़ते लड़ना ही भूल गए हैं।
आइना भी अक्सर पूछे है,
तुम ऐसे मुझे क्यूँ देखते हो?
वो भी है अबसे दुश्मन अपना,
कहता हैं हम- सवाल तुम्हारे हैं-अपने पास ही रखना।
अब तो आलम है ऐसा की,
सवाल समझना भूल गए हैं,
लड़ते-लड़ते लड़ना ही भूल गए हैं।
राष्ट्रवादी हैं हम या हूँ बहु-राष्ट्रवादी,
सुबह शाम बस यही बहस होती है।
आस्था को मिथ्या कहकर,
तड़ीपार होने की माँग होती है।
भारत माता की जय भी है,
मादरे-वतन कहने का भी है शौक़,
पर बहस तो मखौल है,
कुछ ऐसा ही माहौल है,
अब तो आलम है ऐसा की,
बुनियादी हक़ीक़त भूल गए हैं,
लड़ते-लड़ते लड़ना ही भूल गए हैं।
वो मंदिर था या थी मस्जिद,
बस इसी की व्याख्या होती है।
क्यूँ ना चलके ईश्वर भूमि परकुछ और नया रच देते हैं?
आओ चलो लेकर सीमेंट-ईट,
पाठशाला का निर्माण कर देते हैं।
पर अब तो आलम है ऐसा की,
मिलके चलना भूल गए हैं।
लड़ते-लड़ते लड़ना ही भूल गए हैं।
माँ-पिता में भगवान को पाना,
दादी-नानी ने सिखलाया था।
पर तैश है ऐसा-ऐसे तेवर,
बस जंग की बातें होती हैं-
पर अब तो आलम है ऐसा की,
वो सीखें सारी भूल गए हैं-
लड़ते-लड़ते लड़ना ही भूल गए हैं।
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